Sharing is caring!

केरल के अलाप्पुझा में चेट्टीकुलांगरा देवी मंदिर में हर साल कुंबा भरानी त्यौहार मनाया जाता है। इस त्योहार मे देवी भद्रकाली की पुजा कि जाती है।कूडियाट्टम कि ये प्रथा 250 साल पुरानी है।पर इस प्रथा का एक अमानविया चहरा भी है, कूडियाट्टम की एक प्रथा है चूरल मुरियल। इसमे देवी भद्रकाली को प्रसन्न करने के लिये छोटे लडको कि बली देने की प्रथा है।

Image result for chettikulangara kumbha bharani 2018

21वी सदी मे भी भारत के सबसे पढे लिखे राज्य केरल की ये हकीक़त है। हालाँकि चूरल मुरियल मे लडको को बली के लिया मारा नहीं जाता पर उन्के साथ जो होता है वो बेहद असंवेदनशील और अमानवीय है।

चूरल मुरियल मे अपने परिवार के लडके की बली देने की प्रथा थी। जिसमे अमिरो ने अब गरीब घर के बच्चो को गोद ले कर उन्हें  देवी भद्रकाली को चढाना शुरू कर दिया है।

Image result for चेट्टीकुलांगरा देवी मंदिर

कैसे होती है चूरल मुरियल की पूजा

चूरल मुरियल कि शुरुआत होती है किसी गरीब घर के बच्चे को गोद (खरीद कर) लेकर। परिवार अगले 7-10 दिनों तक वझीपाडु (पूजा) की प्रतिज्ञा करते हैं। गोद लिये गए लडको को खास नृत्य भी सिखाया जाता है। कूडियाट्टम के दौरान बच्चों के पसलियों के दोनों तरफ की चमड़ियों में एक सुई से छेद किया जाता है और उसके बाद एक आसन (गुरू) द्वारा उस छेद में सोने का धागा घुसाया जाता है। उसके बाद बाजे-गाजे के साथ भक्तों के द्वारा बच्चों को मंदिर तक ले जाया जाता है। मंदिर पहुंचने के बाद वृद्धों के द्वारा खून से रिस रहे उस घाव से वो धागा निकाला जाता है। और इसके साथ कूडियाट्टम का अंत होता है।

पूजा के बाद की ज़िंदग़ी

क्योंकि इन लडको कि बली दी जाती है इसलिए पूजा के बाद इन्हे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। समाज के लिये इन्हे मरा मान कर इनके साथ अमानवीय व्यवहार होता है। इन्हे अशुभ मान कर किसी अच्छे कर्यक्रम से बहुत दूर रखते है।

चूरल मुरियल के खिलाफ कार्यवाही

नवंबर 2016 में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत इस त्यौहार पर बैन लगाया गया था। कोर्ट ने इस प्रथा पर रोक लगा दी है। इसमे भाग लेने और इसे देखने जाने वाले सभी लोग गैर ज़मानती अपराध के दोषी माने जाएगे। पर राज्य मे बडी पहुच रखने वाले लोग इसका समर्थन करते है। चूरल मुरियल कई बडे नेताओ ने भी बली दी है।

 

 

Sharing is caring!