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आज के इस तेजी से विकसित होने वाले तकनीकि समाज में अगर ऐसा कहीं होता हुआ दिखाई पड़ जाए तो हैरानी ही होती है। एक तरफ पुरे देश में तेजी से महिला अधिकारों की बात हो रही है और वहीँ एक तरफ देश के एक हिस्से में महिलाओं की बोली लगायी जाती है। जौनपुर जिले के दो विकासखंडों में लगभग आधा दर्जन गांवों में मंगता जाती के सैकड़ों परिवार रहते हैं। इस जनजाति के लोगों में लड़कियों की शादी की उम्र हो जानें पर उनकी सार्वजनिक बोली लगती है।

लड़कियों की लगाई जानें वाली इस बोली में सिर्फ उसी समाज के लोग ही हिस्सा ले सकते हैं। जो सबसे ज्यादा बोली लगता है, वही दुल्हन को जीत लेता है और उससे शादी होती है। शादी पुरे रीति-रिवाज के साथ की जाती है। विकास खंड बख्शा के रसिकापुर, सराय विभार और महराजगंज विकास खंड के चांदपुर, लाल बाग, घरवासपुर एवं आराजी सवंसा में इस जाति के लोग रहते हैं। आपको जानकर काफी हैरानी होगी कि इस जनजाति के लोग होली, दिवाली और अन्य त्यौहार मनाते हुए खुद को हिन्दू धर्म से जोड़े हुए है।

इस जनजाति के लोग खुद को शिक्षा से दूर किये हुए है, इसी वजह से काफी पिछड़े हुए हैं। इस जनजाति की लगभग 85 प्रतिशत जनजाति आज भी झोपडी में रहने को मजबूर है। स्कूल अभियान शुरू होने के बाद 60 प्रतिशत बच्चों का स्कूल में दाखिला तो होता है, लेकिन वह बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं। बच्चे दिनभर गाँव में घूमते हैं या फिर घर पर रहते हैं। इस जनजाति के तीरथ के दो बेटे मनोज और अनिल ऐसे हैं, जिन्होंने स्नातक की डिग्री ले रखी है। लेकिन वो भी बैंड पार्टी के साथ बाजा बजाने का काम करते हैं।

इस जनजाति में कन्याओं को समृद्धि का पर्याय माना जाता है। बेटी की शादी की उम्र हो जाने पर भी बाप को कोई चिंता नहीं होती है। यह समाज दहेज़ जैसी कुरूतियों से काफी दूर है। किसी लड़की की शादी की बात चलते ही समाज के युवकों का जमावड़ा लगने लगता है। लड़के लड़की को देखने के बाद बोली लगाते हैं। जो युवक लड़की की सबसे ज्यादा बोली लगता है, उसी से लड़की की शादी कर दी जाती है। कई बार बोली लगाने के दौरान विवाद भी हो जाता है। यहाँ तक बात चली जाती है कि पुलिस को बुलाना पड़ जाता है। कन्या पक्ष वर पक्ष से शादी का पूरा खर्च लेता है। यह राशि 25 हजार से डेढ़ लाख तक होती है।

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