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दीना वाडिया का जन्म से लेकर मृत्यु तक पिता पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की जिंदगी से बहुत साम्य रहा। वे 14-15 अगस्त, 1919 के बीच की आधी रात के कुछ बाद जन्मीं, यानी जिन्ना की दूसरी संतान पाकिस्तान के जन्म के ठीक 28 वर्ष पहले।

दीना वाडिया के जिंदगी के संयोग उनके पिता मोहम्मद अली जिन्ना की जिंदगी से बहुत मिलते रहे। मसलन, शादी। पारसी मित्र सर दिनशॉ पेटिट की अपने से 24 साल छोटी 18 वर्षीय सुंदर बेटी रत्तनबाई से जिन्ना की शादी उस घोर परंपरापंथी जमाने में बहुत विवाद का विषय रही थी।

दीना जब 17 साल की थीं तब उन्हें एक भारतीय पारसी, नेविल वाडिया, से प्यार हो गया। जिन्ना इसके खिलाफ थे, उन्हें लगता था कि दीना किसी मुस्लिम से शादी करें। जिन्ना ने अपनी बेटी से कहा कि देशभर में कई मुस्लिम लड़के हैं, उनमें से किसी से भी शादी कर लो। इस पर दीना ने कहा कि इस देश में हजारों मुस्लिम लड़कियां थीं फिर आपको शादी करने के लिए मेरी पारसी मां ही मिली थीं।

दरअसल जिन्ना ने पारसी लड़की रुट्टी पेटिट (जिन्हें बाद में रतन बाई नाम से जाना गया था) से शादी की थी। दीना के इस जवाब ने जिन्ना की बोलती बंद कर दी और दोनों के बीच बोलचाल बंद हो गई। नेविल से शादी के बाद दीना कई सालों तक मुंबई में ही रहीं और फिर अमेरिका जाकर बस गईं। पिता जिन्ना द्वारा बनाए गए पाकिस्तान देश में दीना ने सिर्फ दो बार कदम रखा। पहली बार वह 1948 में गईं थी, जब उनके पिता जिन्ना की मौत की खबर मिली। पिता के अंतिम दर्शन के बाद वह वापस लौट गईं और दूसरी बार वह 2004 में कराची में अपने पिता के मकबरे पर फूल चढ़ाने गईं थीं।

विभाजन के बाद दीना के सामने सबसे बड़ी मुश्किल थी कि वह किसे अपना देश चुनें। एक तरफ भारत था जहां उन्होंने शादी की, दूसरा उनके पिता द्वारा बनाया गया पाकिस्तान था। दोनों देशों से मोह होने के कारण उन्होंने कराची से कहीं दूर बम्बई के कोलाबा के एक फ्लैट में अपनी बालकनी पर दो झंडे लगाए थे। एक भारत का, दूसरा पाकिस्तान का। दीना के परिवार में उनके पुत्र एवं वाडिया समूह के अध्यक्ष नुसली एन. वाडिया, पुत्री डी.एन. वाडिया और पोते नेस और जेह हैं।
दीना वाडिया का जन्म से लेकर मृत्यु तक पिता पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की जिंदगी से बहुत साम्य रहा। वे 14-15 अगस्त, 1919 के बीच की आधी रात के कुछ बाद जन्मीं, यानी जिन्ना की दूसरी संतान पाकिस्तान के जन्म के ठीक 28 वर्ष पहले।

दीना का जन्म जिन्ना हाउस मुम्बई में न होकर लन्दन के एक थियेटर में शो के दौरान हुआ था, इसीलिए उन्हें ब्रिटिश पासपोर्ट प्राप्त था जिसका उन्होंने टूरिंग के लिए इस्तेमाल भी किया। पिता की तरह उनका भी विधर्मी और तकरीबन 17-18 की उसी उम्र में विवाह हुआ, जिस उम्र में उनकी मां रतनबाई ने अपना हमसफर चुना था। उनका दांपत्य भी पिता की तरह ही सुखद नहीं रहा और पिता की ही तरह उनका मन भी मलाबार हिल के अपने जन्मस्थान जिन्ना हाउस में दिन गुजारने के लिए आजीवन मचलता रहा।

दीना वाडिया के जिंदगी के संयोग उनके पिता मोहम्मद अली जिन्ना की जिंदगी से बहुत मिलते रहे। मसलन शादी। पारसी मित्र सर दिनशॉ पेटिट की अपने से 24 साल छोटी 18 वर्षीय सुंदर बेटी रतनबाई से जिन्ना की शादी उस घोर परंपरापंथी जमाने में बहुत विवाद का विषय रही थी।

जिन्ना की राजनीतिक व्यस्तताओं, मुस्लिम छवि बिगड़ने के डर और उम्र के बड़े फर्क ने धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी पैदा कर दी। रत्ती बीमार रहने लगीं। जिन्ना के पास अब अपनी जवान बीवी और दुधमुंही बेटी के नखरों के लिए वक्त नहीं था। 20 फरवरी, 1929 को महज 29 साल की उम्र में रत्ती की मृत्यु हुई, तब दीना महज 10 साल की थीं।

पिता की छाया से दूर दीना नौकर-चाकरों के हाथ पली-बढ़ी और जिन्ना की बहन फातिमा की देख-भाल में गुमनाम जिंदगी जीती रहीं। इसने दोनों से रिश्तों में तल्खी भर दी। जिन्ना के विरोध के बावजूद 16 नवंबर, 1938 को मलाबार हिल के ऑल सेंट्स चर्च में दीना ने पारसी उद्योगपति नेविल वाडिया से शादी की और न्यूयॉर्क में बस गईं। पिता-पुत्री के संबंध आखिर ऐसे बिगड़े कि बोलचाल ही बंद हो गई।

जिन्ना जब बहुत बीमार थे दीना ने बहुत कोशिश की कि वे उन्हें देखने पाकिस्तान जाएं, पर जिन्ना ने उन्हें वीजा ही नहीं मिलने दिया। सितंबर, 1948 के दिन वे कराची में पिता से अंततः मिल पाईं, पर उनकी अंत्येष्टि पर। फातिमा जिन्ना से उनकी आजीवन नहीं पटी।

अपने पिता से खराब रिश्तों के लिए वे उन्हीं को जिम्मेदार मानती थीं। दीना की दो संतानें हुईं। ये हैं बॉम्बे डाइंग फेम उद्योगपति नुस्ली वाडिया और डॉयना। दीना की वैवाहिक जिंदगी भी सुखद नहीं रही। नेविल के साथ करीब 5 साल बाद
ही उनका अलगाव हो गया।

विभाजन के बाद पाकिस्तान की बजाय उन्होंने भारत को ही चुना और अमेरिका बसने के बावजूद यहीं उनकी जिंदगी के बाकी दिन गुजारने की इच्छा थी जो अपूर्ण रह गई। दीना वाडिया अंतिम बार 2008 में मुंबई आई थीं।

मुंबई के इतिहासकार दीपक राव ने लिखा है कि जिन्ना को इस शहर से अगाध प्रेम था और वे विभाजन के बाद भी अपने बंगले के नाते यह संबंध कायम रखना चाहते थे। देश के बंटवारे तक, कराची जाने से पहले वे यहीं रहे, हालांकि उनके घर दिल्ली में भी थे।

ढाई एकड़ में फैला एक मंजिला विशाल जिन्ना हाउस, मोहम्मद अली जिन्ना ने इंग्लैंड से लौटने के बाद अपनी निगरानी में 1935-36 में बनवाया था। लागत आई थी दो लाख रुपए। मलाबार हिल की माउंट प्लीजेंट रोड (भाऊसाहब हिरे मार्ग) पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के सरकारी निवास ‘वर्षा’ के ठीक सामने स्थित यह बंगला तब ‘साउथ कोर्ट’ कहलाता था। आज इसकी अनुमानित कीमत ढाई हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जाती है।

अखरोट की महंगी लकड़ी की पैनलिंग के साथ इटैलियन संगमरमर के इस्तेमाल से बने शानदार बुर्जों व खूबसूरत खंभों वाला जिन्ना हाउस पहली नजर में ही देखने वालों को मोहित कर लेता है। विशाल अहाते और पोर्टिको के साथ इसकी छत पर घनी छायादार पेड़ों वाला उद्यान भी है।

जिन्ना हाउस नाम के यूरोपीय शैली के इस विला की डिजाइन ब्रितानी वास्तुकार क्लॉड बेटली ने तैयार की थी। यूरोपीय आर्ट डेको शैली के साथ इसमें मुगल और नियो गोथिक शैली के दर्शन भी होते हैं। जिन्ना पाकिस्तान जाने तक इस विला में 1947 तक ठहरे थे।

जिन्ना हाउस महात्मा गांधी से वार्ताओं, बंटवारे को लेकर राष्ट्रीय नेताओं से बैठक और पाकिस्तान निर्माण को लेकर मुस्लिम लीग की मंत्रणाओं का गवाह रहा है और इसमें जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस सरीखे मेहमान रह चुके हैं।

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