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भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र  मेनका गांधी उनकी पत्नी हैं और वरुण गांधी उनके पुत्र। भारत में आपातकाल के समय उनकी भूमिका बहुत विवादास्पद रही। अल्पायु में ही एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी।

एक बार मशहूर पत्रकार विनोद मेहता से पूछा गया कि इतिहास संजय गाँधी को किस तरह से याद करेगा? उनका जवाब था, “इतिहास शायद संजय गाँधी को इतनी तवज्जो न दे और उन्हें नज़रअंदाज़ ही करे। कम से कम मेरी नज़र में भारतीय राजनीति में उनका वजूद एक मामूली ‘ब्लिप’ की तरह था।”

परिवार नियोजन के बारे में जो सख़्त रवैया आपात काल के दौरान अपनाया गया, अगर वो नहीं अपनाया गया होता तो इस मुल्क ने शायद कभी भी छोटा परिवार, सुखी परिवार की परिकल्पना समझने की कोशिश ही नहीं की होती।” लेकिन जिस तरह से परिवार नियोजन कार्यक्रम में ज़बरदस्ती की गई, उसने भारतीय जनमानस को कांग्रेस पार्टी से बहुत बहुत दूर कर दिया। कुमकुम चड्ढा हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़ी हुई वरिष्ठ पत्रकार हैं और उन्होंने बहुत नज़दीक से संजय गाँधी को कवर किया है। कुमकुम चड्ढा बताती हैं, “किस तरह से उन्होंने अपने लोगों से ये सब करने के लिए कहा, ये मैं नहीं जानती, लेकिन इतना मुझे पता है कि उन्होंने ऐसा करने के लिए हर एक के लिए लक्ष्य निर्धारित किए थे। हर कोई चाहता था कि इस लक्ष्य को हर कीमत पर पूरा किया जाए।”

जब आपातकाल की घोषणा हुई तो पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार लुईस एम सिमंस द वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाता के रूप में दिल्ली में तैनात थे. उन्हीं दिनों अमेरिका के इस प्रतिष्ठित अखबार में सिमंस की यह खबर छपी कि एक डिनर पार्टी के दौरान संजय गांधी ने अपनी मां और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कई थप्पड़ मारे

वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने अपनी एक हालिया किताब द इमरजेंसी : अ पर्सनल हिस्ट्री में लिखा है कि यह खबर जंगल में आग की तरह फैली थी. सेंसरशिप की वजह से किसी भारतीय अखबार ने इस खबर पर कुछ नहीं लिखा था.

द वाशिंगटन पोस्ट में आपकी एक खबर छपी थी जिसमें एक सूत्र ने दावा किया था कि एक डिनर पार्टी के दौरान संजय गांधी ने अपनी मां इंदिरा गांधी को छह बार थप्पड़ मारे. यह घटना आपातकाल का ऐलान होने के कितने दिन बाद हुई थी और संजय ने ऐसा क्यों किया था?

थप्पड़ वाली घटना आपातकाल लगने से पहले एक निजी डिनर पार्टी में हुई थी. मैंने तुरंत इसके बारे में नहीं लिखा जैसा कि अमूमन पत्रकार किया करते हैं. मैंने इस खबर को बाद के लिए बचा लिया. अब तो मुझे याद भी नहीं कि क्या मेरे पास ऐसी कोई जानकारी थी कि संजय ने ऐसा क्यों किया.

इस बात को 40 साल हो गए हैं. क्या जिन लोगों से आपको यह जानकारी मिली उन्होंने इस घटना के बारे में बताने के लिए ही आपसे संपर्क किया था या फिर किसी सामान्य बातचीत के दौरान इस घटना का जिक्र हुआ?

दूसरी वाली बात सही है. दरअसल मेरे दो सूत्र थे. ये दो लोग थे जो एक दूसरे को जानते थे और जो इस पार्टी में मौजूद थे. इनमें से एक सज्जन आपातकाल से एक दिन पहले मेरे घर पर थे और उन्होंने मुझसे और मेरी पत्नी से हुई बातचीत में यह किस्सा सुनाया. दूसरे सूत्र ने इसकी पुष्टि की. बात संजय और उनकी मां के रिश्ते पर हो रही थी और उसी दौरान यह बात भी निकल आई.

आपातकाल के बाद मैं श्रीमती गांधी से मिला था जब वे सत्ता से बाहर हो गई थीं. मोरारजी देसाई सरकार ने मुझे वापस बुलाया था. मेरे कुछ समय बाद एक ब्रिटिश पत्रकार को भी भारत से निकाल दिया गया था. जब मैंने श्रीमती गांधी का साक्षात्कार लिया तो यह पत्रकार भी वहां मौजूद था. हमने उनसे पूछा कि उन्होंने हमें निष्कासित क्यों करवाया था. उन्होंने जवाब दिया कि इसमें उनका कोई हाथ नहीं था. मैंने उनसे थप्पड़ वाली घटना के बारे में नहीं पूछा. मुझे लगता है कि मैं हिम्मत नहीं कर पाया. आपातकाल के बाद मैं एक निजी डिनर पार्टी में गया था. वहां राजीव गांधी और उनकी पत्नी सोनिया भी आए हुए थे. एक दर्जन मेहमान और थे. इस दौरान किसी टेबल पर मौजूद शख्स ने सबके बीच ऐलान किया कि मैं ही वह पत्रकार हूं जिसने वह थप्पड़ वाली खबर लिखी थी. राजीव ने अपना सिर हिलाया और मुस्करा दिए. सामने बैठे राजीव से मैंने पूछा, ठीक है? उन्होंने सिर हिलाया और फिर मुस्कराए. उन्होंने कहा कुछ नहीं. सोनिया गुस्से में लग रही थीं. उन्होंने भी कुछ नहीं कहा. संजय गांधी से मेरी मुलाकात कभी नहीं हुई.

 

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